निजी स्कूलों से नहीं समाप्त हो रही भर्राशाही की परंपरा,आरटीई का उखड़ रहा दम, अप्रशिक्षित शिक्षक-शिक्षिका दे रहे तालीम

कटनी। निजी स्कूल संचालक विद्यार्थियों के अभिभावकों से बेहतर शिक्षा के नाम पर मोटी रकम वसूल तो करते हैं लेकिन परिणाम आने के बाद अभिभावक खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं। निजी स्कूलों की शिक्षा प्रणाली और गुणवत्ता को लेकर प्रश्न अभिभावक उठा रहे हैं, वहीं शिक्षा के साथ-साथ जिले के अधिकांशत: निजी स्कूल आरटीई के मापदंडों को भी पूरा नहीं कर रहे हैं। 

निर्देशों पर भारी मनमानी, विभाग मेहरबान

जिले भर में लगभग 100  से अधिक निजी स्कूल संचालित हो रहे हैं, जो मान्यता प्राप्त हैं। शासन ने आरटीई के मापदंड के अनुसार ही इन्हें मान्यता दिया जाना सुनिश्चित किया है, लेकिन जिले के 70 प्रतिशत से अधिक ऐसे निजी स्कूलों को मान्यता दी गई है, जो आरटीई के नियमों को ठेंगा दिखा रहे हैं। इसके बाद भी शिक्षा विभाग की इन पर मेहरबानी क्यों है यह समझ से परे है। इसके चलते भले ही स्कूल संचालकों की चांदी हो रही हो लेकिन इन स्कूलों में पढऩे वाले बच्चों का भविष्य अंधकार में हैं।

सुविधाओं के नाम पर हासिल शून्य

निजी स्कूल वाले अभिभावकों से फीस का पैसा तो पूरा वसूल कर रहे हैं लेकिन सुविधाओं के नाम पर कुछ भी नहीं दे रहे हैं। शासन ने निजी और शासकीय स्कूलों के लिए मापदंड निर्धारित किए हैं। यदि जिले के 6 ब्लाक की बात करें तो यहां निजी प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल 100 से अधिक स्कूल हैं, इनमें से कुछ हाई स्कूल और हायर सेकेंडरी स्कूलें भी है। इन स्कूलों को किस आधार पर मान्यता दी गई है इसका अंदाजा इन स्कूलों की दशा देखकर ही लगाया जा सकता है।

अप्रिशिक्षित शिक्षकों के हाथों छात्रों का भविष्य

आरटीई के अनुसार निजी स्कूलों में बीएड और डीएड के डिग्रीधारी शिक्षक होने चाहिए, लेकिन स्कूलों में इसको दरकिनार करते हुए बीएड और डीएड किए बिना ही स्कूलों में शिक्षकों का रख जाता है, जिन्हें कम वेतन दिया जाता है। ऐसे शिक्षकों में शैक्षणिक अनुभव की कमी होती है जिसका खामियाजा छात्रों को भुगतना पड़ता है जबकि स्कूल संचालकों द्वारा छात्रों के भविष्य की चिंता करने की बजाय अपनी आय की चिंता करने में ही भूमिका अदा की जाती है।

कागजों में पूरे हो रहे मापदंड

नियमानुसार प्राइमरी में 30 बच्चों पर एक शिक्षक और 150 बच्चों से ज्यादा होने पर एक प्रधानाध्यापक, मिडिल स्कूल में 35 बच्चों पर एक शिक्षक की व्यवस्था होने के अलावा निर्देश हैं कि प्राइमरी स्कूल में साल में 200 और मिडिल स्कूल में 220 दिन पढ़ाई होनी चाहिए। हर क्लास के लिए अलग कक्ष होना चाहिए, बगैर मान्यता या मान्यता समाप्त होने पर भी संचालन किया तो एक लाख रूपए जुर्माना, छात्र-छात्राओं के लिए अलग टायलेट होना चाहिए, स्वच्छ व सुरक्षित पेयजल, स्कूल में किचन का शेड होना चाहिए, साल भर का फीस स्ट्रक्चर तय है कि नहीं, इसमें बदलाव तो नहीं होगा। इसके अलावा आरटीई में स्कूलों के मापदंड में खेल मैदान अनिवार्य किया गया है, लेकिन कई निजी स्कूलों में खेल मैदान तो दूर की बात बच्चों को सही से बैठने की जगह भी उपलब्ध नहीं है। बच्चों को खेल मैदान सहित उम्र के हिसाब से खेल सामग्री भी उपलब्ध कराने के निर्देश होने के बावजूद स्कूल संचालक मनमानी पर उतारू हैं तो वहीं जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा स्कूलों की जांच के नाम पर कोरम पूरा कर कर्तव्यपरायणता से इति-श्री कर ली जाती है।

सड़कों पर चल रहे स्कूल

जिले के अधिकतर स्कूल सड़कों पर बने हुए हैं कई स्कूलों में तो बाउंड्रीवॉल भी नहीं बनाई गई हैं। वहीं सड़कों पर स्पीडब्रेकर और संकेतक बोर्ड भी नहीं लगे हैं, इससे नौनिहालों पर हर पल खतरा मंडराता रहता है। कई बार हादसे भी हो जाते हैं इसके बाद भी स्कूल संचालक इस ओर ध्यान नहीं देते हैं। इतना सब होने के बाद भी शिक्षा विभाग किस स्तर से इन स्कूलों को मान्यता दे देता है इससे शिक्षा विभाग पर कई प्रश्न चिन्ह लग रहे हैं। कुल मिलाकर आरटीई के तहत प्राप्त नियमों का पालन कर पाने में असक्षम निजी स्कूल अपने कायदे कानून चला रहे हैं जबकि शिक्षा विभाग के अधिकारी मूक दर्शन बने होने का प्रमाण दे रहे हैं।

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